रक्षाबंधन, राखी, सलूनी,अखींड ज्योति

 रक्षा बंधन एक हिंदी शब्द है जिसका अर्थ होता है "रक्षा बांधने का पर्व"। यह त्योहार भारत में महिलाओं के भाई और बहन के बीच प्रेम और आपसी सम्मान को दिखाने के लिए मनाया जाता है। इस दिन बहन अपने भाई को रक्षाबंधन बांधकर उन्हें सभी बुराईयों से बचाने की कामना करती हैं। इस त्योहार में परिवार का मिलन, आपसी प्रेम, और भाई-बहन के नजदीकी रिश्ते का महत्व बढ़ाया जाता है।

रक्षाबंधन का त्योहार भारतीय संस्कृति में बहुत प्राचीन है।  रक्षाबंधन का उल्लेख महाभारत के कुछ कथाओं में मिलता है जिससे यह प्रत्याक्ष है कि यह त्योहार महाभारत काल से पहले से ही माना जाता था।

महाभारत में रक्षाबंधन की कथा उल्लेखित है जो श्रीकृष्ण और श्री द्रौपदी के बीच हुई थी। इसमें रक्षाबंधन का विशेष महत्व दिखाया गया है और इसे दिव्य सम्बन्ध के प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है।

राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे भारत के विभिन्न राज्यों में रक्षाबंधन को प्राचीनता से मनाया जाता है और इसका महत्वपूर्ण त्योहार है। इसे हिंदू पंचांग के श्रावण मास की पूर्णिमा दिवस को मनाया जाता है, जो जुलाई या अगस्त महीने के बीच होता है।

आधुनिक समय में, रक्षाबंधन को भारत के अलावा विदेशों में भी भारतीय समुदायों द्वारा मनाया जाता है। यह त्योहार भाई-बहन के प्रेम और सम्मान को बढ़ावा देने का एक अवसर है और भारतीय संस्कृति में गहरी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

रक्षाबंधन को भारत में प्रमुख त्योहारों में से एक माना जाता है। यह त्योहार हिंदू पंचांग के श्रावण मास के पूर्णिमा दिवस को मनाया जाता है, 30 AUG 2023 जो श्रावण मास के अंतिम दिन को पड़ता है। यह त्योहार भाई और बहन के बीच प्रेम और सम्मान का प्रतीक है, जिसमें बहन अपने भाई को रक्षा बंधन बांधकर उनकी सुरक्षा और समृद्धि की कामना करती है।

इस दिन, बहन अपने भाई की कलाई पर रंगीन धागे से रक्षाबंधन बांधती हैं, जिसका अर्थ होता है कि वह भाई अपनी बहन की रक्षा करेगा और सभी दुर्भाग्यशाली घटनाओं से उसे बचाएगा। इस दिन परिवार एकजुट होता है और आपसी प्रेम और सम्मान का माहौल बनता है।

रक्षाबंधन को भारत में अन्य नामों से भी जाना जाता है। कुछ प्रमुख नाम हैं:

राखी: रक्षाबंधन को राखी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन बहन अपने भाई को राखी बांधती हैं और भाई उसे उपहार देता हैं।

सलूनी: यह नाम गुजरात राज्य में रक्षाबंधन के लिए प्रचलित है। इस दिन गुजराती परिवारों में बहन अपने भाई की कलाई पर सलूनी बांधती हैं।

अखींड ज्योति: इसे हिमाचल प्रदेश में रक्षाबंधन के लिए उपयोग किया जाता है। इस दिन बहन अपने भाई को अखींड ज्योति देती हैं, जिसे वह अपने जीवन के समस्त संघर्षों में राहत के रूप में धारण कर सके।

ये नाम भिन्न-भिन्न क्षेत्रों और राज्यों में रक्षाबंधन के लिए प्रचलित हैं और इस त्योहार को समर्थन और प्रेम का प्रतीक माना जाता है।

एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, रक्षाबंधन की उत्पत्ति श्री कृष्णा और द्रौपदी के बीच हुई थी।महाभारत काल में, राजा द्रौपद अपने युवा पुत्र दुर्योधन के बलात्कार की कगार पर थे, और द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता मांगी। कृष्णा उन्हें रक्षा करने के लिए तत्काल उपस्थित नहीं हो सके, लेकिन वे अपनी धार्मिक पत्नी राधा को भेजकर रक्षा करने के लिए कहते हैं। राधा ने द्रौपदी को रक्षाबंधन बांधकर दुर्योधन से सुरक्षा की व्रत करने के लिए प्रेरित किया। इस प्रेम भावना और विश्वास के कारण, द्रौपदी को दिव्य सूत्राधार ने अश्वत्थामा द्वारा असीम वस्त्र देने की शक्ति प्राप्त हो गई और उसके लिए उसे श्रीकृष्ण की कृपा मिली।इस कथा से रक्षाबंधन का त्योहार उत्पन्न हुआ, जिसमें भाई और बहन के बीच आपसी प्रेम और सम्मान का प्रतीक है। 




और एक प्रसिद्ध कथा भी है।बालि और देवराज इंद्र के बीच रक्षाबंधन की कथा का विवरण मिलेगा:

कृतयुग में भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया था। भगवान विष्णु के इस अवतार में, उन्होंने एक प्रत्युत्पन्न ब्राह्मण के रूप में अपने दिव्य शक्तियों को छिपा कर दिखाई दी।

एक दिन, भगवान वामन ब्राह्मण के रूप में बालि राजा के दरबार में पहुंचे। भगवान वामन ने बालि राजा से छोटी सी कटोरी माँगी। इस छोटी सी कटोरी में उन्हें देवी अदिति की बहन, देवी अक्षय पत्रिका, के द्वारा भेजी गई थी। देवी अक्षय पत्रिका ने उसके सामने बहुत छोटी सी कटोरी रखी, और भगवान वामन ने उसे देवी अक्षय पत्रिका के साथ मिलाने के लिए कहा।

देवराज इंद्र की बहन देवी अदिति ने भगवान वामन की मांग पूरी की और उन्हें उस छोटी सी कटोरी में अपने भाई के रूप में बाँध दिया। इस तरह, भगवान वामन ने अपने दिव्य रूप से बलि राजा की प्रत्युत्पन्न सांसारिक सम्पत्ति को बाँध लिया और उसे अखंड समृद्धि और सम्मान का प्रतीक बना दिया। भगवान वामन ने बलि राजा को बहुत धन और असीम शक्ति प्रदान की और उसे संसारिक संपत्ति के सम्प्राप्ति में सफल बना दिया।

इसी कथा के आधार पर रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है, जिसमें भाई और बहन के बीच प्रेम और सम्मान का प्रतीक है। इस त्योहार के द्वारा यह प्रत्यारोपण किया जाता है कि भाई अपनी बहन की रक्षा करेगा और उसके साथ सभी दुर्भाग्यशाली घटनाओं से उसे बचाएगा।


रक्षाबंधन के दिन भाई-बहन एक-दूसरे के साथ 

1. राखी बांधना: इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं। राखी एक विशेष धागा होता है, जिसमें संबंध को और दृढ़ता को दर्शाता है। बहन राखी बांधकर अपने भाई को उसकी सुरक्षा और सफलता की कामना करती हैं।

2. भाई बहन के बीच वादा: इस दिन भाई अपनी बहन को प्रतिबद्ध होता है कि वह सभी समय उसका साथ रखेगा और उसके समर्थन में रहेगा।

3. तिलक और शुभकामनाएं: बहन अपने भाई के माथे पर तिलक लगाती हैं और उसे अभिनंदन और शुभकामनाएं देती हैं।

4. उपहार देना: इस अवसर पर भाई बहन एक-दूसरे को उपहार देते हैं। उपहारों में मिठाई, वस्त्र, संगीती आदि शामिल हो सकते हैं।

5. परिवार के साथ समय बिताना: रक्षाबंधन के दिन परिवार के सदस्य एक-दूसरे के साथ समय बिताते हैं और खुशियों का आनंद लेते हैं।

रक्षाबंधन के दिन पर भाई-बहन के बीच यह समर्पण और प्रेम का माहौल होता है और इस दिन को उनके रिश्ते की महत्वपूर्ण याददाश्त में लाने के लिए मनाया जाता है।


रक्षाबंधन का वैदिक तरीका भारतीय संस्कृति में प्राचीन समय से प्रचलित है। वैदिक तरीके में, रक्षाबंधन यज्ञ का आयोजन किया जाता था, जिसमें ब्राह्मण पुरोहित द्वारा विधिवत पूजन और अनुष्ठान किया जाता था।

वैदिक रक्षाबंधन में, इस त्योहार के दिन भाई बहन एकत्र होते थे और उनके सामने विशेष यज्ञ अग्नि की पूजा की जाती थी। ब्राह्मण पुरोहित द्वारा यज्ञ के निर्देशान में रक्षाबंधन के व्रत की शुरुआत की जाती थी।

इसके बाद, ब्राह्मण पुरोहित द्वारा विशेष मंत्रों के साथ राखी बांधने का संस्कार किया जाता था। भाई के बाहरी आसन पर भगवान विष्णु की प्रतिमा रखी जाती थी और उसके चारों ओर ब्राह्मण पुरोहित द्वारा वृंदावनी मंत्र गाए जाते थे। इसके बाद राखी बांधने के लिए भाई का दाहिना हाथ बाँह में रखा जाता था।

ब्राह्मण पुरोहित द्वारा मंत्रों के साथ भाई को रक्षाबंधन बांधा जाता था और उसे रक्षा और समृद्धि के लिए वरदान दिया जाता था। इसके बाद, भाई बहन द्वारा एक-दूसरे को उपहार दिया जाता था।

वैदिक रक्षाबंधन में प्रत्येक क्रिया का मान्यता पूर्ण विधि-विधान के साथ पालन किया जाता था और इसे अनुष्ठान का एक पवित्र पर्व माना जाता था। यह तरीका भारतीय संस्कृति में अपनी शुद्धता और पावनता के लिए प्रशंसा किया जाता है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

માછલી સપનામાં (fish in dream)

NATO

વિશ્વ પર્યાવરણ દિવસ